Kashi Jyotirling Story ( कहानी )
कल्पना कीजिए उस अनादि काल की, जब न तो पृथ्वी का अस्तित्व था, न आकाश का, न तारों की चमक थी, न चंद्रमा की शीतल ज्योत्स्ना। उस समय केवल एक ही सत्ता विद्यमान थी – वह था परम ब्रह्म, जो निराकार, अगोचर, अकल्पनीय और अनंत था। वह चेतना जिसे न तो देखा जा सकता था, न ही समझा जा सकता था, जो सभी ज्ञान और अनुभूति से परे थी। यही परम सत्ता जब साकार रूप में प्रकट हुई, तो वह बनी शिव – संहारक और सृजनकर्ता, योगी और तपस्वी, जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड के आधार हैं।
जब परम शिव प्रकट हुए, तो उन्होंने स्वयं को दो पूरक रूपों में विभाजित किया – शिव और शक्ति। शिव पुरुष तत्व के प्रतीक बने, जबकि शक्ति स्त्री तत्व की अधिष्ठात्री देवी बनीं। ये दोनों तत्व जब एक दूसरे में लीन होते हैं, तभी सृष्टि की प्रक्रिया आरंभ होती है। शिव और शक्ति के इस पवित्र मिलन से दो महान शक्तियाँ प्रकट हुईं – पुरुष (जो बाद में भगवान विष्णु के रूप में अवतरित हुए) और प्रकृति (जो उनकी शक्ति और अर्धांगिनी बनीं)। विष्णु और प्रकृति सम्पूर्ण ब्रह्मांड की आत्मा थे, किन्तु उन्हें एक गहन आंतरिक शून्यता का अनुभव हो रहा था। उनकी पीड़ा का कारण यह था कि उन्हें अपने उद्भव का ज्ञान नहीं था – वे नहीं जानते थे कि उनके माता-पिता कौन हैं, वे स्वयं कैसे अस्तित्व में आए। यह अज्ञानता उन्हें अंदर तक कचोट रही थी। अपनी इस शंका का समाधान ढूँढने के लिए उन्होंने भगवान शिव की शरण ली।
भगवान शिव ने उनकी जिज्ञासा शांत करते हुए समझाया कि ब्रह्मांड की सर्वोत्तम सृष्टि के लिए उन्हें गहन तपस्या करनी होगी। किन्तु यह तपस्या किसी साधारण स्थान पर नहीं की जा सकती थी। इसके लिए एक विशिष्ट, दिव्य और पूर्णतः शुद्ध स्थान की आवश्यकता थी जहाँ की ऊर्जा तपस्या को सफल बना सके। विष्णु और प्रकृति ने सम्पूर्ण ब्रह्मांड में ऐसा स्थान खोजने का प्रयास किया, किन्तु उन्हें कहीं भी संतोष नहीं मिला। निराश होकर वे पुनः शिव के पास पहुँचे और मार्गदर्शन की याचना की। तब भगवान शिव ने अपनी त्रिकालदर्शी दृष्टि से एक अद्भुत दिव्य क्षेत्र की रचना की, जिसे उन्होंने “पंचक्रोशी” नाम दिया। यह कोई सामान्य भूमि नहीं थी – यह क्षेत्र बादलों से भी ऊपर स्थित था और लगभग 10 कोस (30 किलोमीटर) के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ था। यह स्थान पूर्णतः शांत, दिव्य और ध्यान साधना के लिए सर्वोत्तम था।
भगवान विष्णु ने इस पवित्र तपोभूमि पर बैठकर गहन तपस्या आरंभ की। उन्होंने अपनी सम्पूर्ण चेतना को शिव में केन्द्रित कर दिया। उनकी भक्ति और साधना इतनी तीव्र थी कि वहाँ की भूमि भी पवित्र होने लगी। इस तपस्या का प्रभाव इतना गहरा था कि वहाँ अनेक जलधाराएँ स्वतः फूट पड़ीं और सम्पूर्ण पंचक्रोशी क्षेत्र जलमग्न हो गया। तपस्या के दौरान एक अद्भुत घटना घटित हुई – जब भगवान विष्णु ने अपना सिर झुकाया, तो उनके कान से एक दिव्य मणि गिर गई। यह रत्न जल में समा गया और उस स्थान को अत्यंत पवित्र बना दिया। तभी से उस पवित्र क्षेत्र को “मणिकर्णिका” कहा जाने लगा – जहाँ मणि गिरी थी। यह स्थान आज भी काशी में गंगा के तट पर विद्यमान है और मृत्यु के पश्चात् अंतिम संस्कार के लिए सर्वाधिक पवित्र माना जाता है।
जब विष्णु की तपस्या से उत्पन्न जल ने पंचक्रोशी क्षेत्र को लगभग डुबो दिया, तब शिव ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने अपने त्रिशूल की नोक पर सम्पूर्ण पंचक्रोशी को उठा लिया। त्रिशूल पर स्थित यह क्षेत्र अब पूर्णतः सुरक्षित और अमर हो गया। यह घटना दर्शाती है कि शिव केवल संहारक ही नहीं, बल्कि सृष्टि के रक्षक भी हैं। त्रिशूल पर स्थित यह क्षेत्र अब कभी नष्ट नहीं हो सकता था। जब सब कुछ संतुलित हुआ, तब भगवान विष्णु की नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ। उस कमल के ऊपर ब्रह्मा प्रकट हुए। भगवान शिव ने ब्रह्मा को आदेश दिया कि वे सृष्टि की रचना करें। ब्रह्मा ने अपनी दिव्य शक्ति से समस्त ब्रह्मांड, ग्रह-नक्षत्र, वनस्पति, प्राणी और तत्वों की सृष्टि की। इस प्रकार एक सुव्यवस्थित और संतुलित ब्रह्मांड अस्तित्व में आया।
अब प्रश्न यह उठा कि यह दिव्य तपोभूमि पंचक्रोशी, जो बादलों के ऊपर स्थित थी, उसे पृथ्वी पर कैसे लाया जाए? भगवान शिव ने निर्णय लिया कि इसे पृथ्वी पर स्थानांतरित किया जाए ताकि मनुष्य भी यहाँ आकर तप, ध्यान और भक्ति से स्वयं को मुक्त कर सकें। उन्होंने पंचक्रोशी को पृथ्वी पर काशी नगरी में स्थापित किया और स्वयं एक ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए, जिसे “विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग” कहा गया। यह क्षेत्र “अविमुक्त क्षेत्र” कहलाया, जिसका अर्थ है – “जिसे कभी नहीं छोड़ा जाए”। मान्यता है कि शिव ने स्वयं वरदान दिया था कि जब तक ब्रह्मांड रहेगा, वे काशी को कभी नहीं छोड़ेंगे। यही कारण है कि काशी को मोक्ष की नगरी कहा जाता है – यहाँ मृत्यु को प्राप्त होने वाला जीव मोक्ष प्राप्त करता है। ऐसा माना जाता है कि मृत्यु के समय स्वयं भगवान शिव उसके कान में “तारक मंत्र” का उच्चारण करते हैं, जिससे आत्मा सभी बंधनों से मुक्त हो जाती है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जब ब्रह्मा का एक दिन (कल्प) समाप्त होता है, तब प्रलय आता है – जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि नष्ट हो जाती है। किन्तु एक स्थान ऐसा है जो इस प्रलय में भी अक्षुण्ण रहता है – और वह है काशी। यह भूमि शिव के त्रिशूल पर स्थित रहती है, इसलिए प्रलय भी इसे नष्ट नहीं कर सकता। इसीलिए इसे अजर-अमर भूमि कहा गया है। “विश्वेश्वर” शब्द का अर्थ है – सम्पूर्ण विश्व के ईश्वर। काशी के इस ज्योतिर्लिंग को केवल एक मंदिर समझना भूल होगी – यह वह स्थान है जहाँ ब्रह्मांडीय ऊर्जा प्रतिक्षण स्पंदित होती है। यह ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के अनंत रूप का प्रतीक है – जो समय, मृत्यु, कर्म और पुनर्जन्म के बंधनों से परे हैं। यहाँ शिव भक्तों की पीड़ा हरने वाले, ज्ञान देने वाले, और मोक्ष प्रदाता बनकर विराजमान हैं।
काशी विश्वनाथ मंदिर, जहाँ विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है, न केवल एक तीर्थस्थल है, बल्कि एक सजीव ऊर्जा केंद्र है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु न केवल दर्शन करते हैं, बल्कि आत्मिक शुद्धि, ध्यान, तप और भक्ति से स्वयं को शिवमय कर लेते हैं। ऐसा विश्वास है कि जो व्यक्ति काशी में मृत्यु को प्राप्त करता है, उसे पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता। यही कारण है कि करोड़ों श्रद्धालु आज भी इस नगरी की यात्रा करते हैं – जीवन के अंतिम सत्य को पाने के लिए। विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग की यह कथा केवल पुराणों की एक गाथा नहीं, बल्कि शिव तत्व की जीवंत अनुभूति है। यह कथा हमें बताती है कि शिव ही आदि हैं, शिव ही अनंत हैं। उनकी कृपा, उनकी संरचना, उनकी लीलाएँ और उनकी भक्ति – यह सब हमें जीवन के गूढ़ रहस्यों से परिचित कराती हैं। काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि शिव का निवास, सृष्टि का केंद्र, और मोक्ष का द्वार है। यहाँ की हर सांस शिवमय है, हर धड़कन में “हर हर महादेव” की गूँज है।
बोलो नमः पार्वती पतिय हर हर महादेव
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