Vaidyanath Jyotirling Story ( कहानी )
बहुत ही प्राचीन काल की बात है, जब त्रेता युग का दौर था। यह वही युग था जिसमें भगवान राम का अवतार हुआ था और रावण, जो लंका का सम्राट था, अपने चरम पर था। रावण कोई साधारण राक्षस नहीं था। वह अत्यंत बलशाली, विद्वान, तपस्वी और महापंडित था। वह वेदों का ज्ञाता, संगीत और आयुर्वेद का पारंगत था। साथ ही वह भगवान शिव का अनन्य उपासक भी था। उसकी भक्ति इतनी प्रबल थी कि वह दिन-रात केवल शिवजी की उपासना में ही लीन रहता था। रावण की यह भक्ति केवल दिखावे की नहीं थी, बल्कि पूर्ण समर्पण और तपस्या से युक्त थी।
रावण के मन में एक बहुत बड़ा अभिलाषा थी — वह चाहता था कि भगवान शिव स्वयं उसकी राजधानी लंका में स्थायी रूप से निवास करें। उसका विचार था कि यदि भगवान शिव लंका में बस गए, तो वह प्रतिदिन उनका साक्षात् पूजन कर सकेगा और उनकी कृपा से उसे अमरता का वरदान प्राप्त हो जाएगा। यही सोचकर उसने यह संकल्प लिया कि वह भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या करेगा।
रावण हिमालय की ओर निकल पड़ा। वहाँ के एक निर्जन वन में उसने अपना तपस्थान बनाया और तपस्या आरंभ कर दी। यह कोई साधारण तपस्या नहीं थी। उसने घोर उपवास, ध्यान और आत्म-नियंत्रण का मार्ग अपनाया। रावण ने तप के समय अपने शरीर की सारी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली थी। उसका ध्यान केवल भगवान शिव पर केंद्रित था।
जब उसकी तपस्या से भी भगवान शिव प्रसन्न नहीं हुए, तब रावण ने एक और चरम मार्ग अपनाया। उसने अपने सिरों की आहुति देने का निर्णय लिया। रावण के पास कुल दस सिर थे, जो उसकी शक्ति, ज्ञान और अहंकार का प्रतीक माने जाते थे। उसने एक-एक करके अपने नौ सिर काटे और उन्हें भगवान शिव के चरणों में समर्पित कर दिया। हर सिर काटने के बाद वह शिवलिंग के सामने उसे अर्पित करता और फिर अगले सिर की बलि देने तैयार होता।
जब वह अपने अंतिम और दसवें सिर की बलि देने वाला था, तब उसकी अद्वितीय भक्ति, त्याग और तपस्या से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हो गए। उसी क्षण आकाश में घनघोर गर्जना हुई, वातावरण देवगंधों से भर गया और भगवान शिव स्वयं वहां प्रकट हो गए। उनका तेज इतना प्रचंड था कि संपूर्ण वन क्षेत्र आलोकित हो गया।
भगवान शिव ने रावण के सभी कटे हुए सिरों को पुनः जोड़ दिया और उसे जीवनदान दिया। यह चमत्कारिक दृश्य देवताओं और मुनियों के लिए भी अकल्पनीय था। शिवजी ने अपने हाथों से रावण के शरीर को उपचारित किया, उसे स्वस्थ किया। चूंकि भगवान शिव ने रावण को चिकित्सा प्रदान की और उसे पुनः जीवित किया, इसलिए वे उस रूप में “वैद्यनाथ” के रूप में प्रसिद्ध हो गए — अर्थात् देवताओं के वैद्य।
रावण शिवजी की इस कृपा से अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसने भावविभोर होकर भगवान शिव से प्रार्थना की, “हे प्रभु! आप मेरी भक्ति से प्रसन्न हुए, यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है। मेरी एक विनम्र विनती है कि कृपया आप मेरे साथ लंका चलें और वहाँ स्थायी रूप से निवास करें, ताकि मैं प्रतिदिन आपकी आराधना कर सकूं।”
भगवान शिव रावण की गहन भक्ति और समर्पण से प्रभावित हुए। उन्होंने रावण से कहा, “हे लंकेश्वर! मैं तेरे अनुरोध को स्वीकार करता हूँ। मैं तेरे साथ एक विशेष शिवलिंग के रूप में चलूंगा। लेकिन एक शर्त है — इस शिवलिंग को कहीं भी भूमि पर मत रखना। यदि तू इसे ज़मीन पर रख देगा, तो यह वहीं स्थापित हो जाएगा और फिर इसे कोई हिला नहीं सकेगा।”
रावण ने भगवान की इस शर्त को सहर्ष स्वीकार कर लिया और शिवलिंग को श्रद्धा से अपने साथ लेकर लंका की ओर प्रस्थान किया। उसके मन में उमंग थी, उत्साह था और गर्व भी कि अब उसकी राजधानी शिव की स्थायी निवासभूमि बनने जा रही है।
लेकिन देवताओं को यह बात बिल्कुल स्वीकार्य नहीं थी। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि रावण भगवान शिव को लंका ले जा रहा है, तो वे अत्यंत चिंतित हो उठे। देवताओं को भय था कि यदि शिवजी लंका में बस गए, तो रावण अजेय हो जाएगा और अधर्म का साम्राज्य स्थायी रूप से फैल जाएगा। तब वे सभी मिलकर भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उन्हें इस संकट से अवगत कराया।
भगवान विष्णु ने देवताओं की चिंता को गंभीरता से लिया और उन्हें आश्वस्त किया कि वे इस समस्या का समाधान निकालेंगे। उन्होंने एक चतुर योजना बनाई। उन्होंने वरुण देव से अनुरोध किया कि वे रावण के शरीर में इतना जल भर दें कि उसे शीघ्र ही मूत्र त्याग की तीव्र आवश्यकता हो जाए। इस योजना के पीछे यह विचार था कि रावण शिवलिंग को थोड़े समय के लिए किसी और को थमाएगा और वहीं गलती करेगा।
योजना के अनुसार जब रावण देवघर (जो अब झारखंड में स्थित है) के पास पहुंचा, तब उसे मूत्र त्याग की अत्यंत तीव्र इच्छा हुई। वह चिंतित हो गया क्योंकि शिवलिंग को ज़मीन पर नहीं रखना था। तभी उसे वहाँ एक ग्वाला दिखाई दिया — एक बालक जो गायें चरा रहा था। यह कोई सामान्य ग्वाला नहीं था, बल्कि भगवान विष्णु या भगवान गणेश का रूप था, जो रावण की परीक्षा लेने और योजना को सफल बनाने के लिए वहाँ उपस्थित हुए थे।
रावण ने उस ग्वाले से निवेदन किया, “हे बालक! मैं एक आवश्यक कार्य के लिए थोड़ी देर को जा रहा हूँ। कृपया इस शिवलिंग को तब तक अपने हाथ में थामे रहो। ध्यान रहे, इसे ज़मीन पर मत रखना, नहीं तो यह स्थायी रूप से स्थापित हो जाएगा।” बालक ने मुस्कराते हुए सहमति दे दी।
रावण जैसे ही वहाँ से गया, कुछ समय बाद ग्वाले ने जानबूझकर शिवलिंग को ज़मीन पर रख दिया। जैसे ही शिवलिंग भूमि से स्पर्श करता है, वह वहीं स्थायी रूप से स्थापित हो गया। यह देखकर बालक मुस्करा उठा — उसकी योजना सफल हो गई थी।
जब रावण लौटा और यह दृश्य देखा, तो वह क्रोध से भर उठा। उसने बालक को बहुत डांटा और फिर शिवलिंग को उठाने का भरसक प्रयास किया। वह पूरी ताकत से शिवलिंग को खींचने लगा, परंतु वह ज़रा भी नहीं हिला। इतना ही नहीं, उसके जोर लगाने से शिवलिंग का ऊपरी भाग थोड़ा विकृत हो गया, जो आज भी उस रूप में दिखाई देता है।
आख़िरकार रावण ने हार मान ली। उसने शिवलिंग की महत्ता को समझा और वहाँ बैठकर भगवान शिव की पूजा की। वह जान गया कि यह भगवान शिव की इच्छा थी और इस स्थान को उन्होंने स्वयं अपनी स्थली के रूप में चुना है। रावण श्रद्धा से नतमस्तक हुआ और फिर खाली हाथ लंका लौट गया।
जहाँ यह दिव्य शिवलिंग स्थापित हुआ, वही स्थान आज बैद्यनाथ धाम या बाबा बैजनाथ धाम के नाम से प्रसिद्ध है। यह स्थान भारत के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है। यहाँ स्थित शिवलिंग भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और अत्यंत चमत्कारी माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि भगवान शिव यहाँ वैद्य रूप में स्वयं उपस्थित हैं और वे अपने भक्तों के रोग, दुख और क्लेश का निवारण करते हैं।
श्रावण मास में यहाँ लाखों श्रद्धालु कांवड़ यात्रा करके जल अर्पण करते हैं। झारखंड के देवघर जिले में स्थित यह पवित्र स्थल केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। बाबा बैजनाथ का आशीर्वाद पाने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं और यहां आकर अपनी मनोकामनाएं व्यक्त करते हैं।
इस प्रकार रावण की भक्ति, उसका तप, भगवान शिव की कृपा और देवताओं की योजना से जुड़ी यह पौराणिक कथा आज भी भक्तों को प्रेरणा देती है और बैद्यनाथ धाम की महिमा को अमर बनाती है।
बोलो नमः पार्वती पतिय हर हर महादेव……

Also Read:-
Ujjain ke Mahakal : महादेव हुवे प्रकट अपने भक्तों को बचाने 2025
kedarnath Jyotirling : पांडवोकी पाप मुक्त होने की कहानी 2025
Related:-
Kashi Jyotirling : शिव की त्रिशूल पर स्थित अमर तपोभूमि की कहानी 2025
Kashi Jyotirling : शिव की त्रिशूल पर स्थित अमर तपोभूमि की कहानी 2025
