Nandi Maharaj Story ( कहानी )
“एक समय की बात है, एक गुरुकुल में शिलाद नाम के एक तपस्वी ऋषि रहते थे। वे भगवान शिव के परम भक्त थे और अपने जीवन का हर पल शिवजी की आराधना में व्यतीत करते थे। शिलाद ऋषि की तपस्या इतनी गहन थी कि उन्होंने सांसारिक सुखों को पूरी तरह त्याग दिया था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें एक पुत्र का वरदान दिया। कुछ समय बाद, शिलाद ऋषि को एक बालक मिला, जिसका नाम उन्होंने नंदी रखा। नंदी बचपन से ही शिवजी के प्रति अगाध भक्ति रखते थे। वह हमेशा शिवलिंग की पूजा करते और उनके गुणगान में लीन रहते।
नंदी की भक्ति इतनी प्रबल थी कि उन्होंने अपने बचपन से ही शिवजी को ही अपना सर्वस्व मान लिया था। वह प्रतिदिन वन में जाकर शिवलिंग की पूजा करते और घंटों शिवजी के ध्यान में लीन रहते। उनकी भक्ति देखकर ऋषि-मुनि भी चकित हो जाते थे। नंदी के हृदय में शिवजी के प्रति इतना प्रेम था कि उन्हें संसार के किसी भी सुख से कोई मोह नहीं था। वह केवल शिवजी की कृपा पाने की इच्छा रखते थे।
एक दिन, जब नंदी वन में भगवान शिव की आराधना कर रहे थे, तभी वहां दो दिव्य ऋषि आए। उन्होंने नंदी को देखकर कहा, “हे बालक, तुम्हारी आयु बहुत कम है। तुम जल्द ही इस संसार को छोड़ दोगे।” यह सुनकर नंदी व्यथित हो गए। उन्होंने सोचा कि अगर उनकी आयु इतनी कम है, तो वह शिवजी की भक्ति कैसे कर पाएंगे? उन्होंने तुरंत भगवान शिव से प्रार्थना की, “हे प्रभु, मैं आपके चरणों में ही रहना चाहता हूं। मुझे इस संसार से कोई मोह नहीं है।
मैं चाहता हूं कि मैं सदैव आपकी सेवा में लीन रहूं।” नंदी की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और बोले, “नंदी, तुम्हारी भक्ति से मैं अत्यंत प्रसन्न हूं। तुम मेरे सबसे प्रिय भक्त हो। मैं तुम्हें अपना वाहन और अपने गणों का अधिपति बनाऊंगा। तुम सदैव मेरे साथ रहोगे।” यह कहकर शिवजी ने नंदी को एक दिव्य रूप प्रदान किया और उन्हें अपना वाहन बना लिया। तब से नंदी महाराज भगवान शिव के सबसे प्रमुख गण और उनके वाहन के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने शिवजी की सेवा को ही अपना जीवन बना लिया और हमेशा उनके साथ रहने लगे।
नंदी महाराज की भक्ति की एक और घटना प्रसिद्ध है। एक बार की बात है, जब भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश पर्वत पर विराजमान थे। नंदी महाराज हमेशा की तरह शिवजी की सेवा में लीन थे। तभी वहां एक विशालकाय बैल आया और उसने शिवजी से युद्ध की इच्छा प्रकट की। वह बैल बहुत ही शक्तिशाली था और उसने शिवजी को चुनौती दी। शिवजी ने मुस्कुराते हुए नंदी को आगे बढ़ने का इशारा किया। नंदी महाराज ने उस बैल का सामना किया और उसे पराजित कर दिया। यह देखकर शिवजी ने नंदी की वीरता की प्रशंसा की और उन्हें आशीर्वाद दिया। शिवजी ने कहा, “नंदी, तुम्हारी वीरता और भक्ति अद्वितीय है। तुम सदैव मेरे साथ रहोगे और मेरे गणों के अधिपति बनोगे।” नंदी महाराज की भक्ति और सेवा इतनी निस्वार्थ थी कि उन्होंने कभी भी शिवजी से कुछ मांगा नहीं। वह हमेशा उनके चरणों में बैठकर उनकी लीलाओं का आनंद लेते थे। एक बार माता पार्वती ने शिवजी से पूछा, “हे प्रभु, नंदी आपके प्रति इतनी अटूट भक्ति क्यों रखते हैं?” शिवजी ने मुस्कुराते हुए कहा, “नंदी ने मुझे अपना सर्वस्व मान लिया है। उसकी भक्ति निस्वार्थ और निष्काम है। इसलिए वह मेरे हृदय के सबसे निकट है।” शिवजी की यह बात सुनकर माता पार्वती भी नंदी की भक्ति से प्रसन्न हो गईं।
नंदी महाराज की जय

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