Trimbakeshwar Jyotirling Story ( कहानी )
बहुत प्राचीन युग की बात है, जब प्रकृति ने अपनी कृपा इस धरती से जैसे पूरी तरह से समेट ली थी। विशेष रूप से त्र्यंबक क्षेत्र एक भीषण सूखे की चपेट में आ गया था। वर्षों तक आकाश से एक बूँद जल नहीं टपका। धरती की छाती फट गई थी, मिट्टी धूल में बदल चुकी थी, नदियाँ सूखकर रेत के मैदान बन गई थीं, और सभी जलाशय समाप्त हो चुके थे। खेत-खलिहान बंजर और निर्जीव हो चुके थे। पशु-पक्षी भूख और प्यास से व्याकुल होकर इधर-उधर भटकने लगे थे। मानव समाज भय, निराशा और कष्ट में डूबा हुआ त्राहि-त्राहि कर रहा था। संपूर्ण त्र्यंबक क्षेत्र जैसे जीवन से शून्य, एक मृत्युपुंज बन चुका था।
ऐसे कठिन समय में इसी क्षेत्र में निवास करते थे एक महान तपस्वी, करुणा के मूर्तिमान स्वरूप और निःस्वार्थ सेवा में रत — महर्षि गौतम। वे अपने तप और त्याग के लिए प्रसिद्ध थे, और जनकल्याण के प्रति पूर्णतः समर्पित थे। जब उन्होंने चारों ओर इस संकट को देखा, तो उनका संवेदनशील हृदय पीड़ा से भर उठा। उन्होंने दृढ़ निश्चय किया कि वे इस सूखे और पीड़ित भूमि के लिए कोई स्थायी समाधान खोज निकालेंगे। इसी उद्देश्य से उन्होंने जल के अधिपति वरुण देव को प्रसन्न करने हेतु छह महीनों तक कठोर तपस्या करने का संकल्प लिया। वे जंगल में एकांत स्थान पर बैठकर अन्न-जल त्याग कर केवल प्रभु-भक्ति और ध्यान में लीन हो गए।
महर्षि गौतम की गहन साधना से प्रसन्न होकर स्वयं जलदेव वरुण प्रकट हुए। उनके आगमन से सारा वातावरण दिव्यता से भर गया। वे तेजस्वी, शांत और सौम्य स्वरूप में महर्षि के समक्ष प्रकट हुए और बोले, “हे महामुनि! तुम्हारी तपस्या ने मुझे अत्यंत प्रसन्न किया है। जो भी वर मांगोगे, मैं तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण करूँगा।”
महर्षि गौतम ने अत्यंत विनम्रता और करुणा से कहा, “हे जलाधिपति! मैं अपने लिए कुछ नहीं चाहता। मेरी यही प्रार्थना है कि यह भूमि, जो आज जल के बिना तड़प रही है, उसे जीवनदायिनी जलधारा मिल जाए। यदि आपकी कृपा से यहाँ जल प्रवाहित हो जाए, तो यह धरती पुनः हरी-भरी हो सकती है।”
वरुण देव ने भगवान शिव से इस पुनीत कार्य में सहयोग करने का अनुरोध किया। तब भगवान शिव ने आदेश दिया कि ब्रह्मगिरी पर्वत के समीप एक गहरा कुंड खुदवाया जाए। महर्षि गौतम ने स्वयं अपने हाथों से उस स्थान पर एक विशाल कुंड का निर्माण कराया। फिर वरुण देव ने अपनी दिव्य शक्ति से उस कुंड को अमृत तुल्य जल से भर दिया। देखते ही देखते सूखी हुई धरती में हरियाली लौट आई, नदियों में जल प्रवाहित होने लगा, पशु-पक्षी वापस लौट आए, और समूचे त्र्यंबक क्षेत्र में जीवन का पुनः संचार हो गया।
जहाँ अच्छाई होती है, वहीं दुर्भाग्यवश ईर्ष्या और अहंकार भी जन्म लेते हैं। महर्षि गौतम के इस महान कार्य से कुछ अन्य ऋषियों के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हो गई। उनका यश, उनकी ख्याति और उनकी लोकप्रियता उन संतों को असह्य लगने लगी। एक दिन जब महर्षि के शिष्य जल लेने उस पवित्र कुंड पर पहुँचे, तो उसी समय कुछ अन्य ऋषियों की पत्नियाँ भी वहाँ स्नान हेतु पहुँचीं। महर्षि की पत्नी माता अहल्या ने अत्यंत विनम्रता से उन्हें थोड़ी देर प्रतीक्षा करने को कहा, क्योंकि शिष्य पहले से उपस्थित थे। यह बात उन स्त्रियों को नागवार गुज़री। उन्होंने इसे अपना अपमान समझा और इस प्रसंग को तोड़-मरोड़ कर अपने पतियों से कह दिया। पहले से ही ईर्ष्यालु ऋषियों को अब एक बहाना मिल गया।
ईर्ष्या से अंधे उन संतों ने अब महर्षि गौतम को बदनाम करने का षड्यंत्र रचा। उन्होंने भगवान गणेश की आराधना शुरू की और उनसे प्रार्थना की कि वे किसी प्रकार महर्षि को अपयश दिला दें। गणेश जी ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की, परंतु उनके हठ के आगे वे विवश हो गए। अंततः उन्होंने एक गौ का रूप धारण किया और महर्षि के आश्रम में पहुँच गए। महर्षि गौतम ने उस गाय को अत्यंत प्रेमपूर्वक भोजन कराया, लेकिन जैसे ही वह गाय भोजन ग्रहण कर रही थी, वह वहीं गिरकर मृत हो गई।
यह सब पहले से छिपे संतों और उनकी पत्नियों ने देखा और शोर मचाना शुरू कर दिया। उन्होंने महर्षि गौतम को गौहत्या का दोषी ठहराया और उनके विरुद्ध सामाजिक बहिष्कार का आदेश दिया। महर्षि गौतम और माता अहल्या स्तब्ध रह गए। वे इस अन्याय से अत्यंत दुखी हुए, परंतु उन्होंने किसी से कोई विवाद नहीं किया और अपने आश्रम व भूमि का त्याग कर दिया।
इस अपमान और अन्याय को सहकर भी महर्षि गौतम ने बदले की भावना नहीं रखी। उन्होंने ऋषियों को क्षमा कर दिया और सत्य को सिद्ध करने हेतु एक लंबी तप यात्रा आरंभ की। उन्होंने पृथ्वी की तीन बार परिक्रमा की, एक महीने तक निराहार उपवास किया, ब्रह्मगिरी पर्वत की सौ बार परिक्रमा की, और दस करोड़ पार्थिव शिवलिंग बनाकर भगवान शिव का पूजन किया। इसके बाद उन्होंने माँ गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए कठोर तपस्या की।
उनकी भक्ति और तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए और बोले, “हे गौतम! तुम पूर्णतः निर्दोष हो। सच्चाई तुम्हारे पक्ष में है। ईर्ष्या और अहंकार के वशीभूत होकर अन्य ऋषियों ने तुम्हारे साथ अन्याय किया है।” महर्षि ने भगवान से माँ गंगा को इस क्षेत्र में लाने की प्रार्थना की ताकि यह भूमि सदा पवित्र और जीवनदायिनी बनी रहे।
माँ गंगा ने पृथ्वी पर अवतरित होने से पूर्व एक शर्त रखी — “यदि भगवान शिव अपने समस्त परिवार सहित इस स्थान पर त्र्यंबक में लिंग रूप में निवास करें और समस्त देवता भी यहाँ वास करें, तभी मैं अवतरित होऊँगी।” भगवान शिव ने यह शर्त स्वीकार कर ली।
इस प्रकार माँ गंगा गोदावरी नदी के रूप में ब्रह्मगिरी पर्वत से पृथ्वी पर प्रकट हुईं और त्र्यंबक क्षेत्र को जलमय कर दिया। भगवान शिव अपने परिवार सहित त्र्यंबकेश्वर में लिंग रूप में विराजमान हुए। इस ज्योतिर्लिंग की विशेषता यह है कि इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश — तीनों का समवेत स्वरूप विद्यमान है। इसी कारण इस ज्योतिर्लिंग को “त्र्यंबकेश्वर” कहा जाता है — त्रि + अंबक अर्थात् तीन नेत्रों वाले शिव।
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की यह प्रेरणादायक कथा हमें यह सिखाती है कि सच्चाई और भक्ति के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कभी पराजित नहीं होता। चाहे असत्य और अन्याय कितना भी प्रबल क्यों न हो, अंततः सत्य की विजय होती है। महर्षि गौतम का जीवन इसका जीवंत उदाहरण है — जिनकी करुणा, तप और निःस्वार्थ सेवा ने एक समूचे क्षेत्र को जीवनदान दिया। आज भी जो श्रद्धालु त्र्यंबकेश्वर आते हैं, वे उस दिव्यता और शक्ति को अनुभव करते हैं और शिव के इस दिव्य ज्योतिर्लिंग के दर्शन से आत्मिक शांति और जीवन की समस्याओं से मुक्ति पाते हैं। यह तीर्थस्थल एक शाश्वत संदेश देता है — धर्म, सत्य और भक्ति सदा विजयी होते हैं ……।
बोलो नमः पार्वती पतिय हर हर महादेव…

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