Vitthal Rukmini Story ( कहानी )
कृष्ण और रुक्मिणी की प्रेम कहानी भक्ति और प्रेम का एक अद्भुत संगम है। विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी, सुंदरता और गुणों से संपन्न थीं। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। रुक्मिणी ने बचपन से ही कृष्ण की महिमा सुनी थी। उनके बारे में सुनकर उनके मन में कृष्ण के प्रति गहरी भक्ति और प्रेम जाग उठा। वह मन ही मन कृष्ण को अपना जीवनसाथी मानने लगीं।
द्वारका पहुँचकर कृष्ण और रुक्मिणी का विवाह हुआ। यह विवाह न केवल दो हृदयों का मिलन था, बल्कि भक्ति और प्रेम का प्रतीक भी बन गया। रुक्मिणी ने कृष्ण के साथ अपना जीवन सुखपूर्वक बिताया। वह कृष्ण की प्रिय पत्नी बनीं और उनके जीवन में विशेष स्थान रखती थीं। रुक्मिणी कृष्ण की प्रिय पत्नी थीं, और उनका प्रेम अटूट था। लेकिन एक दिन, एक छोटी सी गतलफेमि ने उनके बीच दूरी पैदा कर दी।
रुक्मिणी द्वारका से दूर एक वन में चली गईं। वहाँ उन्होंने एक छोटा सा आश्रम बनाया और एकांत में रहने लगीं। उनका मन कृष्ण के प्रेम से भरा था, लेकिन वह अपने अहंकार और दुख के कारण वापस नहीं लौट रही थीं। दूसरी ओर, कृष्ण को जब पता चला कि रुक्मिणी द्वारका छोड़कर चली गई हैं, तो वह बहुत चिंतित हो गए। उन्होंने रुक्मिणी को खोजने के लिए अपने सैनिकों को भेजा, लेकिन रुक्मिणी कहीं नहीं मिलीं। तब कृष्ण स्वयं उन्हें ढूंढने निकल पड़े।
किसी ने सोचा नहीं था, उस्सी वन्न में लिखी जाएगी एक और कहानी |भक्त पुंडलिक थे रहते वाहा जिसकी वजह लिखी गई एक और कहानी | पुंडलिक एक महान भक्त थे, जो अपने माता-पिता की सेवा में लीन रहते थे। उनकी भक्ति और कर्तव्यनिष्ठा की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। एक दिन, भगवान कृष्ण ने उनकी भक्ति की परीक्षा लेने का निर्णय लिया। कृष्ण पुंडलिक के आश्रम पहुँचे, लेकिन पुंडलिक अपने माता-पिता की सेवा में इतने तल्लीन थे कि उन्होंने कृष्ण को तुरंत ध्यान नहीं दिया। उन्होंने कृष्ण से कहा, “हे प्रभु, कृपया थोड़ा प्रतीक्षा करें। मैं अपने माता-पिता की सेवा पूर्ण करके आपकी सेवा में उपस्थित होऊंगा।”
यह कहानी हमें सिखाती है कि भक्ति और कर्तव्यनिष्ठा से भगवान प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों के लिए सदैव तैयार रहते हैं। कहा जाता है कि जब विठ्ठल ने पुंडलिक की भक्ति से प्रसन्न होकर पंढरपुर में निवास करने का निर्णय लिया, तो रुक्मिणी भी उनके साथ आईं। वह विठ्ठल की सेवा और भक्ति में पूरी तरह से लीन हो गईं। रुक्मिणी की भक्ति ने पंढरपुर को और पवित्र बना दिया। आज भी, पंढरपुर में विठ्ठल और रुक्मिणी की भक्ति की गाथा गाई जाती है, और भक्त उनके दर्शन के लिए दूर-दूर से आते हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति और प्रेम से भगवान प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों के साथ सदैव रहते हैं।
|| जय हरि विट्ठल ||
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